Tuesday, April 22, 2008

कभी कहा ना किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे ख़बर हो गयी ज़माने को

सुना है गैर की महफिल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा लूँ ग़रीब खाने को

दुआ बहार की मांगी तो इतने फूल खिले
कही जगह न मिली मेरे आशियाने को

चमन में जाना तो सय्याद देख कर जाना
अकेले छोड़ कर आया हूँ आशियाने को

मेरी लहद पे पतंगो का खून होता है
हुजुर शमा ना लाया करे जलाने को

दबा के कब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम
ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को

अब आगे इस में तुम्हारे भी नाम आएगा
जो हुकुम हो तो यहीं छोड़ दूँ फ़साने को

Qamar ज़रा भी नही तुमको खौफ-ऐ-रुसवाई
के चाँदनी पे चले हो उन्हें मनाने को

2 Comments:

At 11:35 AM, Blogger Go Forward said...

http://urdushayari8.blogspot.com/2020/02/attitude-status-for-whatsapp-in-english.html

 
At 10:46 AM, Blogger Nouman said...

best poetry

 

Post a Comment

<< Home